यह उन दिनों की बात है

यह उन दिनों की बात है,

जब दोस्ती के इस दिन पर, हम दोस्तों से मिला करते थे।

कभी किसी के घर की छत पर,

तो कभी उस पुराने पुल के ऊपर,

हम सपने बुना करते थे।

और आज दोस्ती के इस दिन पर,

बस एक रील भेजकर दोस्ती निभाते हैं।

 

यह उन दिनों की बात है,

जब प्रसंग कोई भी हो, हम एक-दूसरे के घर में होते थे।

जन्मदिन हो, शादी हो या पूजा,

या फिर कभी मातम का माहौल हो,

हम हमेशा साथ खड़े होते थे।

और आज एक-दूसरे की ख़बर भी

हम किसी और से सुना करते हैं।

 

यह उन दिनों की बात है,

जब कैंटीन में बैठे-बैठे, एक-दूसरे से मज़ाक करते थे।

बात कितनी भी चुभने वाली हो,

मुस्कुराके आपस में बाते करते थे,

हम उसे कभी दिल पर नहीं लेते थे।

और आज राजनीति की चर्चा पर भी,

सालों पुरानी दोस्ती से मुँह मोड़ लेते हैं।